Malegaon Blast Case

Malegaon blast case: 2008 में महाराष्ट्र के मालेगांव शहर में हुए बम धमाके के मामले में गुरुवार को एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) की एक विशेष अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित समेत सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि इनके खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं मिले और केवल अनुमान या धारणा के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

यूएपीए की मंजूरी में खामी:

अदालत ने कहा कि इस केस में आतंकवाद विरोधी कानून यानी यूएपीए (Unlawful Activities Prevention Act) लागू करना ही गलत था, क्योंकि इसके लिए जो कानूनी मंजूरी चाहिए होती है, वह सही ढंग से नहीं ली गई थी।

सबूतों में गंभीर कमी:

अदालत ने माना कि मालेगांव में विस्फोट हुआ था, लेकिन यह साबित नहीं हो सका कि घटनास्थल पर मिली मोटरसाइकिल में बम लगाया गया था। अभियोजन पक्ष उस मोटरसाइकिल को विस्फोटक से निर्णायक रूप से जोड़ने में विफल रहा।

पीड़ितों की संख्या में भी गड़बड़ी:

अदालत ने बताया कि शुरू में घायल लोगों की संख्या 101 बताई गई थी, लेकिन जांच में सिर्फ 95 लोगों के घायल होने की पुष्टि हुई। कुछ मेडिकल दस्तावेजों में हेराफेरी भी पाई गई।

‘अभिनव भारत’ संगठन पर भी संदेह:

अभियोजन ने दावा किया था कि हिन्दुत्व विचारधारा से जुड़े संगठन अभिनव भारत का इस धमाके में हाथ था। लेकिन अदालत को इसके पक्ष में कोई ठोस सबूत नहीं मिला। अदालत ने कहा कि संगठन का नाम केवल सामान्य संदर्भ में लिया गया था।

मुआवजे का आदेश:

अदालत ने आदेश दिया कि धमाके में मारे गए छह लोगों के परिवारों को 2-2 लाख रुपये और घायल हुए हर व्यक्ति को 50,000 रुपये मुआवजा दिया जाए।

इस फैसले के जरिए अदालत ने यह साफ कर दिया कि सिर्फ शक, राजनीतिक दबाव या सामाजिक धारणा के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। आतंकवाद के मामलों में भी ठोस, कानूनी और वैज्ञानिक सबूत जरूरी होते हैं। इस ऐतिहासिक फैसले से साफ हुआ कि न्याय प्रक्रिया में केवल भावना नहीं, तथ्य और साक्ष्य की अहम भूमिका होती है।

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