‘सॉफ्ट तख्तापलट’ की साजिश नाकाम, जनरल वकार उज जमां ने समय रहते संभाला मोर्चा
ढाका: बांग्लादेश की राजनीति में उथल-पुथल थमने का नाम नहीं ले रही है। अगस्त 2024 में शेख हसीना के प्रधानमंत्री पद से हटने और मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनने के बाद से सत्ता के केंद्रों में खींचतान तेज हो गई है। इसी बीच ढाका से एक बड़ा और चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है, जिसमें सेना प्रमुख जनरल वकार उज जमां और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार खलीलुर्रहमान के बीच गंभीर टकराव की खबरें हैं।
रिपोर्टों के मुताबिक, सेना प्रमुख जनरल वकार उज जमां ने खलीलुर्रहमान की उस कथित ‘सॉफ्ट तख्तापलट’ साजिश को विफल कर दिया है, जिसका उद्देश्य सेना के शीर्ष ढांचे में अपने समर्थकों को बैठाकर जमां की पकड़ कमजोर करना था। कहा जा रहा है कि खलीलुर्रहमान दो वरिष्ठ लेफ्टिनेंट जनरलों को अहम पदों पर नियुक्त कराने की कोशिश में जुटे थे, ताकि सैन्य नेतृत्व पर उनका प्रभाव बढ़ सके।
खाली पद बने साजिश की जमीन
यह अवसर तब बना जब नेशनल डिफेंस कॉलेज के कमांडेंट लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद शाहीनुल हक और चीफ ऑफ जनरल स्टाफ (CGS) लेफ्टिनेंट जनरल मिजानुर रहमान शमीम के सेवानिवृत्त होने की स्थिति बनी। इसी खालीपन को देखते हुए खलीलुर्रहमान ने योजना तैयार की कि इन पदों पर अपने भरोसेमंद अधिकारियों को बैठाया जाए।
योजना के तहत आर्म्ड फोर्सेज डिवीजन में प्रिंसिपल स्टाफ ऑफिसर लेफ्टिनेंट जनरल एस.एम. कामरुल हसन को अगला CGS और क्वार्टर मास्टर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद फैजुर रहमान को नया PSO बनाए जाने की कोशिश की गई। ये दोनों पद सीधे चीफ एडवाइजर के कार्यालय के अंतर्गत आते हैं और इन पर बैठे अधिकारी शासन के बेहद करीब माने जाते हैं।
जमां की त्वरित कार्रवाई
हालांकि, जनरल वकार उज जमां ने समय रहते इस पूरी कवायद को भांप लिया। उन्होंने तेज और निर्णायक कदम उठाते हुए लेफ्टिनेंट जनरल फैजुर रहमान और लेफ्टिनेंट जनरल कामरुल हसन की प्रस्तावित नियुक्तियों को रोक दिया और प्रक्रिया को टाल दिया। इस कदम से खलीलुर्रहमान को बड़ा झटका लगा और सेना प्रमुख ने अपनी स्थिति को मजबूत बनाए रखा।
सियासी गलियारों में बढ़ी हलचल
इस घटनाक्रम के बाद बांग्लादेश के सत्ता गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज है। विश्लेषकों का मानना है कि यह टकराव केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उस व्यापक सत्ता-संघर्ष का हिस्सा है, जो अंतरिम व्यवस्था के दौर में अलग-अलग संस्थानों के बीच उभरकर सामने आ रहा है। आने वाले दिनों में यह खींचतान बांग्लादेश की राजनीति और सुरक्षा ढांचे की दिशा तय कर सकती है।
























































































































































































































