Navrashtra Bharat (73)

5 सितंबर 2025 को, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों और धमकियों ने वैश्विक कूटनीति में एक नया तनाव पैदा किया है। इस पृष्ठभूमि में, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के तियानजिन में आयोजित 25वें शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ महत्वपूर्ण द्विपक्षीय मुलाकातें कीं। इन बैठकों में वैश्विक व्यापार, आर्थिक सहयोग, और भू-राजनीतिक रणनीतियों पर गहन चर्चा हुई। ट्रंप की भारत और चीन पर उच्च टैरिफ लगाने की धमकी के जवाब में यह मुलाकात वैश्विक शक्ति संतुलन में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

ट्रंप की टैरिफ धमकी: पृष्ठभूमि

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में भारत, चीन, और रूस जैसे देशों पर कड़े आर्थिक प्रतिबंधों की चेतावनी दी है, विशेष रूप से रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों को निशाना बनाते हुए। ट्रंप ने रूस से तेल आयात करने वाले देशों, जैसे भारत और चीन, पर 100% तक के सेकेंडरी टैरिफ लगाने की धमकी दी है, अगर रूस ने यूक्रेन युद्ध को 50 दिनों के भीतर समाप्त नहीं किया। इसके अलावा, भारत पर 50% टैरिफ पहले ही लागू किया जा चुका है, जिसे ट्रंप ने “एकतरफा व्यापार नीति” का जवाब बताया है।

ट्रंप ने विशेष रूप से भारत पर रूसी तेल खरीदने के लिए अतिरिक्त 25% टैरिफ की घोषणा की थी, जो 20 जुलाई 2025 को लागू हुए 25% शुल्क के अतिरिक्त है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि “दूसरे और तीसरे चरण” के प्रतिबंध अभी बाकी हैं। इस नीति का उद्देश्य रूस पर आर्थिक दबाव डालना है, लेकिन इसका असर भारत और चीन जैसे देशों की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार नीतियों पर भी पड़ रहा है।

भारत-चीन-रूस की बैठक: प्रमुख बिंदु

चीन के तियानजिन में आयोजित एससीओ शिखर सम्मेलन में भारत, चीन, और रूस ने एकजुटता का प्रदर्शन किया। इस बैठक के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • वैश्विक व्यापार में सहयोग: तीनों नेताओं ने ट्रंप की टैरिफ नीतियों के खिलाफ एक साझा रणनीति पर चर्चा की। भारत और चीन, जो रूस के प्रमुख व्यापारिक साझेदार हैं, ने वैकल्पिक व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने पर जोर दिया। रूस के साथ भारत का व्यापार, विशेष रूप से जीवाश्म ईंधन के आयात में, हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ा है।
  • रणनीतिक गठजोड़: बैठक में रूस-भारत-चीन (RIC) त्रिकोण की संभावित वापसी पर विचार किया गया, जो 1990 के दशक में प्रस्तावित हुआ था। यह गठजोड़ अमेरिकी प्रभाव को संतुलित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है, विशेष रूप से तब जब ट्रंप की नीतियाँ पारंपरिक गठबंधनों को तोड़ रही हैं।
  • ऊर्जा सुरक्षा: भारत, जो अपनी 85% तेल आवश्यकताओं के लिए आयात पर निर्भर है और रूस से 40% तेल आयात करता है, ने अपनी ऊर्जा रणनीति को मज़बूत करने पर बल दिया। चीन ने भी रूस के साथ अपने 240 बिलियन डॉलर के व्यापार को वैध और कानूनी ठहराते हुए ट्रंप की धमकियों की आलोचना की।
  • कूटनीतिक संदेश: चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने संबोधन में कहा कि भारत और चीन को “दोस्त और साझेदार” बनना चाहिए। यह बयान भारत-चीन सीमा विवाद को सुलझाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है, जो ट्रंप की नीतियों के खिलाफ एकजुटता को और मज़बूत करता है।

भारत की स्थिति: रणनीति या विचारधारा?

भारत ने इस बैठक में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने पर जोर दिया। ट्रंप की 50% टैरिफ नीति ने भारत को वैकल्पिक रणनीतियाँ तलाशने के लिए मजबूर किया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का झुकाव विचारधारा से अधिक रणनीति पर आधारित है। भारत पश्चिम से पूरी तरह दूर नहीं हो रहा, बल्कि वह अपने राष्ट्रीय हितों, विशेष रूप से ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा, को प्राथमिकता दे रहा है।

भारत के विदेश मंत्रालय ने ट्रंप के टैरिफ को “अनुचित और अन्यायपूर्ण” करार दिया है, यह तर्क देते हुए कि भारत की ऊर्जा आवश्यकताएँ और रणनीतिक स्वायत्तता का सम्मान किया जाना चाहिए।

वैश्विक प्रभाव और प्रतिक्रियाएँ

ट्रंप की टैरिफ नीतियों ने न केवल भारत, चीन, और रूस को करीब लाया है, बल्कि अन्य देशों जैसे ब्राजील, जापान, और दक्षिण कोरिया को भी जवाबी कदम उठाने के लिए प्रेरित किया है। उदाहरण के लिए, ब्राजील ने 6 बिलियन डॉलर का प्रोत्साहन पैकेज घोषित किया है, और कनाडा व जापान ने भी जवाबी टैरिफ लागू किए हैं।

चीन के विदेश मंत्रालय ने ट्रंप की “जबरदस्ती” रणनीति की कड़ी आलोचना की और कहा कि “टैरिफ युद्ध में कोई विजेता नहीं होता।” नाटो महासचिव मार्क रुटे ने भी भारत, चीन, और ब्राजील को रूस के साथ व्यापार जारी रखने पर 100-500% टैरिफ की चेतावनी दी है, जिसने इस तनाव को और बढ़ा दिया है।

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