नई दिल्ली में कूटनीति का माहौल गर्म है—रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 2022 के बाद पहली बार भारत की यात्रा पर आ रहे हैं। यह मुलाकात सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में भारत की सैन्य शक्ति और ऊर्जा सुरक्षा को नई ऊँचाइयों पर ले जाने वाला बड़ा मौका मानी जा रही है। ऐसे समय में जब अमेरिका रूस के साथ व्यापार पर सख्ती बढ़ा रहा है, भारत और रूस के रिश्ते लगातार मजबूती की दिशा में बढ़ रहे हैं।
रणनीतिक साझेदारी को नई रफ्तार
4-5 दिसंबर को होने वाले 23वें भारत-रूस शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और व्लादिमीर पुतिन आमने-सामने बैठकर रक्षा, ऊर्जा और व्यापार से जुड़े महत्वपूर्ण समझौतों को अंतिम रूप दे सकते हैं। कजान में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी को रूस के सर्वोच्च सम्मान से नवाजे जाने के बाद से इस यात्रा की अहमियत और बढ़ गई है।
भारत-रूस के रिश्ते 1947 से लगातार मजबूत रहे हैं, और पुतिन की यह यात्रा इन ऐतिहासिक संबंधों में एक अहम अध्याय जोड़ सकती है।
सबसे ज्यादा फोकस—डिफेंस डील्स
S-400 के बाद अब S-500 की तैयारी?
पहले से ही 5 अरब डॉलर का S-400 एयर डिफेंस सिस्टम का सौदा चर्चा में रहा है। तीन रेजिमेंट भारत को मिल चुकी हैं और बाकी अगले साल तक आने की उम्मीद है।
अब बातचीत अतिरिक्त S-400 के साथ-साथ S-500 जैसे अति-आधुनिक सिस्टम पर भी हो सकती है—जो मिसाइल हमलों और दुश्मन के एयरोस्पेस हथियारों को भी नाकाम करने में सक्षम माना जाता है।
SU-57 स्टील्थ फाइटर जेट—राफेल का भी ‘अगला स्तर’
भारत को रूस के SU-57 पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट का प्रस्ताव मिला है। दिग्गज सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह क्षमताओं में राफेल से भी आगे है।
सबसे बड़ी बात—रूस 70% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर देने के लिए तैयार है।
इसका मतलब:
- भविष्य में भारत में ही उत्पादन
- विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम
- रक्षा निर्माण में बड़ा आर्थिक बूस्ट
आत्मनिर्भर भारत मिशन को मजबूत आधार
यह शिखर सम्मेलन सिर्फ हथियारों की खरीद का सौदा नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी और उत्पादन साझेदारी के जरिए भारत को रक्षा के वैश्विक हब के रूप में स्थापित करने की दिशा में कदम है।





















































































































































