Navrashtra Bharat


​साल 2025 भारत के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। दोबारा सत्ता में आने के बाद, डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पुरानी शैली में भारत पर दबाव बनाना शुरू किया। उनका सीधा संदेश था “या तो तुम हमारे साथ हो, या हमारे खिलाफ।” लेकिन भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) को चुना।


​1. ट्रंप की वे पांच शर्तें जो भारत को मंजूर नहीं थीं
​अमेरिका चाहता था कि भारत एक स्वतंत्र देश के बजाय उसके ‘जूनियर पार्टनर’ की तरह व्यवहार करे। उसने पाँच ऐसी शर्तें रखीं जो भारत की संप्रभुता पर हमला थीं I
​रूस से नाता तोड़ो: अमेरिका चाहता था कि भारत रूस से सस्ता तेल और हथियार लेना बंद कर दे। भारत के लिए रूस एक पुराना और भरोसेमंद दोस्त है, जो सामरिक संतुलन के लिए जरूरी है।
​खेती और डेयरी का बाजार: अमेरिका अपने कॉरपोरेट्स के लिए भारत के डेयरी और कृषि क्षेत्र को खोलना चाहता था। अगर मोदी सरकार इसे मान लेती, तो भारत के करोड़ों किसानों की रोजी-रोटी खतरे में पड़ जाती।
​F-35 का लालच और जाल: अमेरिका ने F-35 लड़ाकू विमान देने की पेशकश तो की, लेकिन बिना तकनीक हस्तांतरण (ToT) के भारत का रुख साफ था, हम सिर्फ सामान नहीं खरीदेंगे, हम तकनीक चाहते हैं ताकि भविष्य में आत्मनिर्भर बन सकें।


​2. वाशिंगटन का आर्थिक हमला
​जब भारत ने झुकने से मना किया, तो ट्रंप प्रशासन ने ‘प्रतिशोध’ की नीति अपनाई। उन्होंने भारत के सबसे बड़े व्यापारिक घरानों, रिलायंस और अडानी को निशाना बनाया। न्याय विभाग (DoJ) और अन्य संस्थाओं के जरिए जांच बिठाई गई ताकि भारतीय अर्थव्यवस्था की नींव हिल जाए। इसके अलावा, H1B वीजा के नियमों को कड़ा कर भारतीय इंजीनियरों और टेक कंपनियों को डराने की कोशिश की गई। स्कॉट बेसेंट और पीटर नवारो जैसे सख्त आर्थिक रणनीतिकारों को भारत के खिलाफ मोर्चे पर लगा दिया गया।


3. टियांजिन समिट और ‘क्रेमलिन’ का खुलासा
​असली मोड़ तब आया जब SCO की टियांजिन समिट हुई। वहाँ भारत, रूस और चीन की बढ़ती नजदीकियों ने व्हाइट हाउस की नींद उड़ा दी। इसी दौरान रूसी खुफिया जानकारी (Kremlin Intel) ने एक बड़ा खुलासा किया कि ट्रंप प्रशासन पर्दे के पीछे से भारत में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की योजना बना रहा है। जब यह साजिश पकड़ी गई, तो ट्रंप ने अचानक अपना रुख बदला (Volte-face) और दोस्ती का हाथ बढ़ाने का दिखावा किया। लेकिन भारत समझ चुका था कि यह सिर्फ एक चाल है।


4. 2026: एक सशक्त भारत का उदय
​आज 2026 में भारत ने न केवल खुद को संभाला है, बल्कि अमेरिका को कड़ा संदेश भी दिया है I
RELOS समझौता : भारत ने रूस के साथ ‘लॉजिस्टिक एक्सचेंज’ (RELOS) समझौता करके रूसी जहाजों को हिंद महासागर (IOR) में जगह दे दी। यह अमेरिका के लिए सबसे बड़ा झटका था क्योंकि वह इस क्षेत्र को अपनी जागीर समझता था।
चीन के साथ ‘मॉस्को फॉर्मूला’: रूस की मदद से भारत ने चीन के साथ अपने विवादों को सुलझाना शुरू किया। इससे अमेरिका का वह कार्ड छिन गया जिसमें वह भारत को चीन के खिलाफ इस्तेमाल करना चाहता था।
​त्रि-आयामी रणनीति (Three-Way Strategy): भारत ने अमेरिका को तीन हिस्सों में बांटकर डील किया:
​व्हाइट हाउस: यहाँ मोदी सरकार ने ‘पत्थर जैसा’ कड़ा रुख अपनाया और किसी भी दबाव में नहीं आए।
​अमेरिकी कांग्रेस: भारत ने वहां के सांसदों के साथ संवाद बनाए रखा ताकि कूटनीतिक रास्ते बंद न हों।
कॉरपोरेट अमेरिका: एलन मस्क और अन्य बड़े निवेशकों के लिए भारत ने दरवाजे खुले रखे, ताकि अमेरिकी व्यापारिक जगत ही अपनी सरकार पर भारत से रिश्ते सुधारने का दबाव बनाए।

भारत ने कैसे अपनी अर्थव्यवस्था को ढाल बनाया और रूस के साथ मिलकर अमेरिका के ‘हथियार कूटनीति’ (Weaponized Diplomacy) को नाकाम किया।


​1. आर्थिक युद्ध: रिलायंस, अडानी और ‘डॉलर’ का दबदबा
​जब अमेरिका ने भारतीय कॉरपोरेट घरानों को निशाना बनाया, तो उसका मकसद सिर्फ कंपनियों को रोकना नहीं था, बल्कि भारत की विदेशी मुद्रा और शेयर बाजार को अस्थिर करना था।
​रिलायंस और रूसी तेल: रिलायंस रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदकर उसे रिफाइन कर यूरोप को बेच रहा था। अमेरिका ने इसे ‘आर्बिट्राज’ (Arbitrage) बताकर रोकने की कोशिश की। भारत ने साफ कहा कि यह हमारे ऊर्जा सुरक्षा का मामला है।
​अडानी और बुनियादी ढांचा: अडानी समूह को निशाना बनाकर अमेरिका भारत के बंदरगाहों और रणनीतिक इंफ्रास्ट्रक्चर में हो रहे विकास को धीमा करना चाहता था। भारत ने इसके जवाब में घरेलू संस्थानों (LIC, SBI) और अन्य मित्र देशों के फंड्स का सहारा लेकर बाजार को गिरने नहीं दिया।
​डी-डॉलरइजेशन (De-dollarization): भारत और रूस ने ‘रुपया-रुबल’ व्यापार को और मजबूत किया। जब ट्रंप ने भारत को ‘US Tech और Finance’ से काटने की धमकी दी, तो भारत ने अपने घरेलू पेमेंट सिस्टम (UPI) और रूसी ‘MIR’ कार्ड के एकीकरण को तेज कर दिया।


2. भारत-रूस रक्षा सौदे: RELOS और सामरिक गहराई
​रूस के साथ भारत के रिश्ते अब सिर्फ ‘खरीदार और विक्रेता’ के नहीं रहे, बल्कि वे एक सामरिक गठबंधन में बदल चुके हैं।
RELOS (Reciprocal Exchange of Logistics Agreement): यह समझौता 2026 की सबसे बड़ी घटना है। इसके तहत:
​रूसी नौसेना अब भारत के पोर्ट्स (जैसे विशाखापत्तनम और कारवार) का उपयोग ईंधन और मरम्मत के लिए कर सकती है।
​बदले में भारत को आर्कटिक क्षेत्र और रूस के सुदूर पूर्व (Vladivostok) में रूसी सैन्य अड्डों तक पहुंच मिल गई है।
​इससे हिंद महासागर में अमेरिका के ‘डिएगो गार्सिया’ बेस का प्रभाव कम हो गया है।
हथियारों का स्वदेशीकरण: अमेरिका के F-35 के बदले भारत ने रूस के साथ Su-57 या उन्नत Su-30MKI अपग्रेड पर ध्यान दिया, जिसमें तकनीक पूरी तरह भारत को दी जा रही है।


​3. अमेरिका की आंतरिक फूट का फायदा
​भारत ने बहुत समझदारी से अमेरिका के अंदर की राजनीति का उपयोग किया।
भारत का रवैया परिणाम
ट्रंप व्हाइट हाउस कड़ा विरोध और सीधी बात ट्रंप को एहसास हुआ कि भारत को ‘धौंस’ से नहीं जीता जा सकता।
अमेरिकी कांग्रेस लॉबिंग और लोकतंत्र का हवाला रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों दलों के कई सांसदों ने भारत पर प्रतिबंधों का विरोध किया।
कॉरपोरेट अमेरिका निवेश के अवसर (Apple, Tesla) एलन मस्क जैसे लोग भारत के पक्ष में खड़े हो गए क्योंकि उन्हें भारत का विशाल बाजार चाहिए था।

4. 2026 का नया ‘पावर प्ले’
​नवंबर 2025 में जब पीएम मोदी और ट्रंप के बीच फोन पर बात हुई, तो मोदी का लहजा एक ‘ग्लोबल लीडर’ का था। व्हाइट हाउस ने उस कॉल के बारे में चुप्पी साधे रखी क्योंकि ट्रंप को अपनी ही शर्तों पर पीछे हटना पड़ा था। भारत ने स्पष्ट संदेश दिया


​1. हम किसी गुट (Bloc) का हिस्सा नहीं बनेंगे।
​2. हम अपनी शर्तों पर व्यापार करेंगे।
​3. हमारी विदेश नीति का केंद्र अब ‘वाशिंगटन’ नहीं बल्कि ‘नई दिल्ली’ है।

2026 का भारत अब रक्षात्मक नहीं है। वह रूस की मदद से चीन को संतुलित कर रहा है और अपनी आर्थिक ताकत से अमेरिका को मजबूर कर रहा है कि वह भारत को एक समान शक्ति (Equal Power) के रूप में स्वीकार करे।

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