India vulnerable to chronic aircraft noise thanks to regulatory gaps

नई दिल्लीः हाल ही में हुए शोध में यह पता चला है कि विमान से निकलने वाला शोर न केवल लोगों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालता है, बल्कि भारत में इसके संरक्षण के लिए बने नियमों में कई कमी भी देखने को मिलती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि विमान शोर से होने वाले स्वास्थ्य प्रभाव इस बात पर निर्भर करते हैं कि शोर कितनी तीव्रता से उत्पन्न हो रहा है, उसकी आवृत्ति कितनी बार है, वह कितनी देर तक जारी रहता है और क्या व्यक्ति के पास प्राकृतिक रूप से स्वस्थ होने के लिए पर्याप्त समय है, विशेष रूप से रात में जब वे सो रहे होते हैं।

विमान के शोर प्रदूषण की समस्या वैश्विक स्तर पर मानी जाती है, लेकिन भारत जैसे विकासशील देश में इसके विनियामक पहलुओं में कई महत्वपूर्ण अंतर और कमियां हैं। कई बार एयरपोर्ट के आसपास रहने वाले लोग इस शोर के कारण मानसिक तनाव, नींद में खलल, उच्च रक्तचाप जैसी स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रसित हो जाते हैं। शोध का कहना है कि यदि लोगों को एक के बाद एक शोर का सामना करना पड़ता रहे और वे पूर्ण आराम का समय न पा सकें तो इसका हृदय, तंत्रिका तंत्र तथा मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव अत्यधिक बढ़ जाता है।

विशेषज्ञों ने कहा कि भारत में विमान शोर को नियंत्रित करने के लिए बनाए गए दिशानिर्देश पर्याप्त नहीं हैं, जिससे यह समस्या और गहरी होती जा रही है। एयरपोर्ट अथॉरिटी और नियामक संस्थाओं को चाहिए कि वे इस दिशा में ठोस और प्रभावी कदम उठाएं। वातावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और नागरिक उड्डयन मंत्रालय को मिलकर ऐसे नियम बनाना चाहिए जो न केवल शोर की तीव्रता को सीमित करें, बल्कि इसके आवृत्ति और अवधि पर भी नियंत्रण रखें।

साथ ही वैज्ञानिकों ने यह भी सुझाव दिया कि शहरों में एयरपोर्ट के आसपास के क्षेत्रों में भवन निर्माण और शहरी नियोजन इस प्रकार किया जाना चाहिए जिससे कि शोर के प्रभाव को कम किया जा सके। बेहतर ध्वनि अवरोधक उपाय और हरित पट्टी बनाना भी शोर को कम करने में मददगार साबित होगा।

शोध में यह भी स्पष्ट किया गया कि विमान शोर से प्रभावित लोग न केवल तत्काल शारीरिक क्षति महसूस करते हैं बल्कि यह लगातार लंबे समय तक रहने वाले लोगों के लिए गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा करता है, जैसे हृदय रोग, मानसिक तनाव में वृद्धि और बेहतर नींद की कमी। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत को अपनी नीतियों में सुधार लाने और तकनीकी सहायता को बढ़ावा देने की सख्त जरूरत है ताकि आम जनता को सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण सुनिश्चित किया जा सके।

इस निष्कर्ष के बाद नागरिक उड्डयन मंत्रालय एवं पर्यावरण मंत्रालय के बीच समन्वय बढ़ाने की भी मांग उठी है ताकि शोर प्रदूषण की समस्या का समाधान तेजी से निकाला जा सके और जरूरतमंद इलाकों में राहत पहुंचाई जा सके। विदेशों के सफल मॉडलों को अपनाकर भारत में भी विमान शोर नियंत्रण हेतु बेहतर व्यवस्थाएं विकसित की जानी चाहिए।

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