मुंबई, 27 अप्रैल: मुंबई में अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाएं कई चुनौतियों का सामना करती हैं, जिनमें से एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या तपेदिक (टीबी) है। शहर की तेज़ी से बढ़ती आबादी और गरीबी की मार झेलती ये महिलाएं न तो पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच पाती हैं और न ही काम के दौरान बीमारी से निजात पाने के लिए उचित समर्थन।
टीबी, जो एक संक्रामक बीमारी है, मुंबई की गरीब और वंचित आबादी में अधिक देखा जाता है। खासकर वे महिलाएं जो घरेलू काम, ढुलाई, या सड़क किनारे छोटे व्यवसायों में लगी होती हैं, वे इस रोग की चपेट में आसानी से आ जाती हैं। काम की अनियमितता, खराब पोषण, और असुरक्षित आवास इनके स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं।
एक स्थानीय एनजीओ की रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई की लगभग 40% टीबी के रोगी महिलाएं हैं, जिन्हें सही इलाज और देखभाल नहीं मिल पाती। कारणों में सामाजिक कलंक, आर्थिक दिक्कतें और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी मुख्य हैं। महिला मरीजों को कार्यस्थल पर भी समर्थन नहीं मिलता, जिससे वे न तो अपने इलाज में नियमित रह पाती हैं और न ही पूरी तरह स्वस्थ होकर काम पर वापस जा पाती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं के लिए टीबी से लड़ाई केवल चिकित्सा तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इसे सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भी संबोधित करने की जरूरत है। सरकार और स्थानीय संस्थाओं को मिलकर प्रभावी जागरूकता अभियान चलाने, महिला कर्मचारीयों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने, और सामाजिक संरक्षण उपायों पर ध्यान देना होगा।
इसके अलावा, सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की भूमिका भी अहम हो गई है, जो गरीब महिलाओं तक चिकित्सा सहायता पहुंचाने में मदद कर रहे हैं। वे न केवल टीबी के लक्षणों की पहचान करते हैं, बल्कि उपचार में निरंतरता बनाए रखने के लिए भी प्रेरित करते हैं।
मुंबई के अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाएं फिर भी अपने परिवार के लिए संबल बनी हुई हैं, परंतु उनकी सेहत की अनदेखी लंबे समय तक शहर की सामाजिक चुनौतियों में गुम होती जा रही है। सरकार और समाज की व्यापक भागीदारी के बिना, इन महिलाओं का जीवन बेहतर बनाना मुश्किल होगा। भाजपा की टीबी मुक्त भारत योजना जैसे राष्ट्रीय प्रयासों को क्षेत्रीय स्तर पर भी मजबूती देने की जरूरत है।
अंत में, मुंबई में कामकाजी महिलाओं पर टीबी का प्रभाव सिर्फ एक स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता का मुद्दा है। इसे नजरंदाज करने से न केवल रोगग्रस्त महिलाएं बल्कि पूरा समुदाय प्रभावित होगा। ऐसे में सभी पक्षों को मिलकर कदम उठाने होंगे ताकि ये महिलाएं स्वस्थ, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन बिता सकें।





































