नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में शस्त्रक्रिया के माध्यम से बच्चों के जन्म (सी-सेक्शन) की संख्या में पिछले कुछ वर्षों में तेजी से वृद्धि देखी गई है, जिसे लेकर विशेषज्ञ गंभीर चिंता जता रहे हैं। चिकित्सा जगत के वरिष्ठ डॉक्टर और स्वास्थ्य अधिकारी इस प्रवृत्ति को एक गंभीर चुनौती मान रहे हैं, जो न केवल माताओं के स्वास्थ्य पर प्रभाव डालती है, बल्कि व्यापक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और व्यवहार को भी प्रभावित करती है।
स्वास्थ्य मंत्रालय के ताजा आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में कुल प्रसवों में सी-सेक्शन की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस वृद्धि के पीछे कई कारण हैं, जिनमें मरीजों की बढ़ती मांग, चिकित्सकों की प्राथमिकता, और अस्पतालों में मेडिकल प्रैक्टिस के बदलते तरीके प्रमुख हैं।
डॉ. सीमा अग्रवाल, जो कि एक प्रसूति और स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं, बताती हैं, “अक्सर डॉक्टर किसी भी जटिल या पैशेंट के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए सी-सेक्शन का विकल्प चुनते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में इसके प्रयोग में तेजी देखी गई है, जो हर बार आवश्यक नहीं होती। यह प्रवृत्ति माताओं के लिए जोखिम भरी साबित हो सकती है।”
विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि सी-सेक्शन डिलीवरी के बाद महिला को सामान्य प्रसव की तुलना में अधिक समय तक अस्पताल में रहना पड़ता है, और इसके साथ ही संक्रमण और अन्य जटिलताएं भी बढ़ सकती हैं। इसके चलते स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
दिल्ली सरकार ने भी इस बढ़ती समस्या को समझते हुए अस्पतालों को निर्देश दिए हैं कि वे सी-सेक्शन के मामलों को सावधानीपूर्वक जांच कर ही अपनाएं। इसके अलावा, प्रसव के दौरान प्राकृतिक तरीके को प्राथमिकता दी जाए, जब भी संभव हो।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की अपील है कि गर्भवती महिलाएं अपने प्रसव के विकल्पों के बारे में पूरी जानकारी हासिल करें और केवल आवश्यक होने पर ही सी-सेक्शन का चुनाव करें। साथ ही, बेहतर स्वास्थ्य जागरूकता अभियान और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से चिकित्सकों को नैतिक और वैज्ञानिक रूप से सही मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
सरकार और स्वास्थ्य विभाग इस मुद्दे को गंभीरता से उठा रहे हैं और विभिन्न पहलुओं पर विचार कर स्थिति में सुधार के लिए कदम उठा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं, ताकि माताओं और नवजात शिशुओं का स्वास्थ्य सुरक्षित रहे और बेहतर स्वास्थ्य परिणाम सुनिश्चित हो सकें।































































