The world is moving on from paying publishers — India should too

पिछले 18 महीनों में अकादमिक प्रकाशन के भू-राजनीति में जो बदलाव हुए हैं, वे पिछले दो दशकों की तुलना में कहीं अधिक गहराई वाले और तीव्र हैं। चीन अपनी स्वायत्तता बनाने में जुटा है, अमेरिका प्रकाशन लागतों की कड़ी जांच कर रहा है, ऑस्ट्रेलिया त्वरित पहुंच को प्राथमिकता दे रहा है, यूरोप और अफ्रीका सार्वजनिक अवसंरचना के निर्माण में लगे हैं, और लैटिन अमेरिका आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में सबसे आगे है। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत इस सूची में कहां है?

भारत में शैक्षिक और शोध प्रकाशन की व्यवस्था में अभी भी कई चुनौतियां व्याप्त हैं। अधिकांश भारतीय संस्थान और शोधकर्ता अभी भी विदेशी प्रकाशकों पर निर्भर हैं, जो महंगे सब्सक्रिप्शन मॉडल के तहत शोध पत्र प्रकाशित करते हैं। इससे न केवल खर्च बढ़ता है बल्कि शोध का व्यापक और मुक्त प्रवाह भी बाधित होता है। भारत के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वह इस क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करे और एक स्वतंत्र, पारदर्शी और किफायती प्रणाली विकसित करे।

चीन ने अपनी राष्ट्रीय नीति के तहत शैक्षिक प्रकाशनों में स्वायत्तता को बढ़ावा दिया है, जिससे शोध समुदाय को अधिक संसाधन और नियंत्रण प्राप्त हुआ है। वहीं, यूरोप और अफ्रीका में ओपन एक्सेस मॉडल और सार्वजनिक अवसंरचनाओं का निर्माण तेजी से हो रहा है, जो शोध को सभी के लिए उपलब्ध कराने का प्रयास है। भारत में भी इस दिशा में पहलें हो रही हैं, जैसे की इंकोफेयर और ओपन जर्नल सिस्टम्स का इस्तेमाल, लेकिन अभी व्यापक स्तर पर निरंतरता और स्थिरता की आवश्यकता है।

अनुसंधान और विकास के लिए वित्तीय संसाधनों का प्रभावी प्रबंधन भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। अमेरिकी सरकारी एजेंसियां अत्यधिक मूल्य वाले प्रकाशन लागतों की समीक्षा कर रही हैं ताकि धन का सही उपयोग हो सके। भारत को चाहिए कि वह अपनी नीतियों को ऐसी दिशा में संरेखित करे जिससे सर्वोत्तम संसाधनों का लाभ अनुसंधान के विकास में हो।

भारत का शैक्षिक प्रकाशन परिदृश्य केवल आर्थिक पक्ष से ही नहीं, बल्कि तकनीकी और सांस्कृतिक बदलावों से भी प्रभावित है। भारतीय शोध समुदाय को अपनी भाषा, सांस्कृतिक संदर्भ और विषयगत आवश्यकताओं के हिसाब से अधिक सक्रियता के साथ प्रकाशनों को बढ़ावा देना चाहिए। इससे न सिर्फ भारत के शोधकों का सशक्तिकरण होगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी उनकी उपस्थिति स्थापित होगी।

अंतत: भारत को वैश्विक परिदृश्य में अपने रोल को पुनः परिभाषित करने और एक मजबूत, स्वतंत्र और समावेशी प्रकाशन ढांचे के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। यह न केवल शोध की गुणवत्ता और पहुंच को बढ़ाएगा, बल्कि लंबे समय में राष्ट्रीय विकास और ज्ञान उत्पादन के लिए भी महत्वपूर्ण साबित होगा।

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