नई दिल्ली। मानसून का मौसम भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यह न केवल फसलों के लिए पानी लेकर आता है, बल्कि देश की जल-विद्युत योजनाओं और जल संसाधनों के प्रबंधन के लिए भी अहम भूमिका निभाता है। हालांकि मानसून केवल जमीन पर गिरने वाली बारिश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे वातावरण में कई किलोमीटर ऊपर बनने वाले तूफानों की निगरानी करना भी जरूरी होता है।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) इन तूफानों और बादलों को समझने व उनका पूर्वानुमान लगाने के लिए INSAT सैटेलाइट्स के माध्यम से उपग्रह इमेजरी का उपयोग करता है। INSAT सैटेलाइटों के द्वारा ली गई तस्वीरें और डेटा वैज्ञानिकों को यह जानकारी देते हैं कि मानसून की गतिविधियां कैसे प्रगति कर रही हैं और किन इलाकों में भारी बरसात की संभावना है।
INSAT उपग्रहों की सहायता से बादलों की गति, विकास और दिशा का पता लगाया जाता है। उपग्रह द्वारा भेजी गई इमेजरी से यह भी समझा जाता है कि कौन से बादल किसानों की फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं और किस जगह पर अधिक ध्यान देना आवश्यक है। यह तकनीक पूर्वानुमान को अधिक सटीक और त्वरित बनाती है जिससे किसान, प्रशासन और आम जनता ठीक समय पर तैयारी कर सकते हैं।
मानसून के दौरान कई बार अचानक बवंडर और तेज आंधी-तूफान बन जाते हैं, जो जीवन और संपत्ति के लिए खतरनाक हो सकते हैं। ऐसे में IMD द्वारा INSAT सैटेलाइट इमेजरी की मदद से हवा की दिशा, दबाव और बादलों की मोटाई का विश्लेषण कर खतरे के पूर्वानुमान को समय रहते प्रकाशित किया जाता है। इससे बचाव के कार्य किए जा सकते हैं।
मौसम वैज्ञानिक बताते हैं कि वर्तमान में हमारे पास जो उपग्रह तकनीक है उसकी सहायता से हम मानसून की पैठ, अवधि और तीव्रता को बेहतर ढंग से समझ पा रहे हैं। इससे न सिर्फ कृषि क्षेत्र को बल्कि जल प्रबंधन और आपदा प्रबंधन की योजनाओं को भी बल मिलता है।
अंत में कहा जा सकता है कि मानसून केवल बारिश नहीं, बल्कि एक जटिल प्राकृतिक प्रक्रिया है जो कई स्तरों पर हो रही घटनाओं का परिणाम है। INSAT सैटेलाइट इमेजरी के माध्यम से बादलों और तूफानों की निगरानी इस प्राकृतिक चक्र को समझने में मदद करती है। इस तकनीक से किसान, नागरिक और सरकार बेहतर तैयारी कर सकते हैं और मानसून के प्रभावों को कम कर सकते हैं।





















































