Hypermetabolism linked to early-life adversity can be harmful in long term: Study

नई दिल्ली। हाल ही में किए गए एक अध्ययन में यह पाया गया है कि बचपन में सामना की गई कठिनाइयाँ शरीर के माइटोकॉन्ड्रियल कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकती हैं, जो दीर्घकालिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। शोधकर्ताओं ने कहा है कि तनाव और विपरीत परिस्थितियां केवल संचित नहीं होतीं, बल्कि प्रत्येक प्रकार की adversity (कठिनाई) माइटोकॉन्ड्रिया की क्रियाशीलता से विशेष रूप से जुड़ी होती है।

अध्ययन में यह खुलासा हुआ कि प्रारंभिक जीवन के दौरान अनुभव की गई कठिनाइयां मेटाबोलिज्म को इस तरह प्रभावित कर सकती हैं, जिससे शरीर की ऊर्जा-उत्पादन प्रणाली पर दबाव बढ़ता है। इससे हाइपरमेटाबोलिज्म की स्थिति उत्पन्न होती है, जिसका अर्थ है कि शरीर अपनी ऊर्जा उत्पादन दर को आवश्यकता से अधिक बढ़ा देता है। यह स्थिति दीर्घकालिक रूप से स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है।

शोध के प्रमुख ने बताया, ‘हमारी खोजों से यह स्पष्ट होता है कि कुल मिलाकर adversity के प्रभावों को समझना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी देखना आवश्यक है कि किस प्रकार की adversity का व्यक्ति सामना कर रहा है। इससे माइटोकॉन्ड्रियल कार्यप्रणाली पर किस प्रकार का अनूठा प्रभाव पड़ता है।’

माइटोकॉन्ड्रिया मानव कोशिकाओं के ऊर्जा केंद्र होते हैं और इनके सही ढंग से काम करने से ही शरीर की समग्र स्वास्थ्य स्थिति बेहतर रहती है। अध्ययन में यह भी उल्लेख किया गया कि खतरे या विपरीत परिस्थितियों का अनुभव करने वाले व्यक्तियों में माइटोकॉन्ड्रियल हानियों के कारण हृदय रोग, मधुमेह और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकारों का जोखिम बढ़ सकता है।

विशेषज्ञों ने कहा कि प्रारंभिक जीवन में adversity का प्रभाव केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसके मानसिक और भावनात्मक पहलू भी होते हैं, जो व्यक्ति के जीवन के अन्य क्षेत्र पर भी गहरे प्रभाव डालते हैं। इस अध्ययन से यह भी उम्मीद की जा रही है कि भविष्य में ऐसी रणनीतियाँ विकसित की जाएंगी जो प्रारंभिक जीवन के संकटों को पहचानकर समय रहते उनका समाधान करें और दीर्घकालिक स्वास्थ्य पर उनके प्रभाव को कम करें।

अंतिम रूप से यह अध्ययन स्वास्थ्य जगत के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रदान करता है कि बच्चों और युवाओं में प्रारंभिक जीवन की adversities को गंभीरता से लेना आवश्यक है ताकि उन्हें बेहतर और स्वस्थ जीवन जीने का अवसर दिया जा सके। यह शोध न केवल चिकित्सकों बल्कि नीति निर्धारकों के लिए भी उपयोगी होगा, जो स्वस्थ समाज के निर्माण में योगदान दे सकता है।

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