नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर वैज्ञानिकों ने एक अहम घोषणा की है। अब जो सबसे खराब और विनाशकारी जलवायु परिदृश्य माना जाता था, वह वास्तविकता में आने की संभावना काफी कम हो गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, उत्सर्जन दर में अपेक्षित वृद्धि धीमी हुई है और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की व्यापक अपनाने की प्रक्रिया भी तेजी से बढ़ी है। इन दोनों कारकों के चलते ‘डूम्सडे’ या भीषण जलवायु परिवर्तन की आशंका को अब खारिज किया जा रहा है।
जलवायु वैज्ञानिकों के समूह ने बताया कि कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में अब धीमी वृद्धि देखने को मिल रही है। इसके पीछे प्रमुख कारण हैं सौर, पवन आदि नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग में तेज वृद्धि, और दुनिया भर के देशों द्वारा उत्सर्जन नियंत्रित करने के लिए अपनाई गई कड़े नियमावली। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह रुझान जारी रहता है, तो वैश्विक तापमान में अत्यधिक वृद्धि की आशंका कतई कम हो जाएगी।
हालांकि यह अच्छी खबर है, लेकिन देश के लिए पूरी तस्वीर सुखद नहीं है। भारत में औद्योगीकरण और शहरीकरण की तेज गति लगातार ऊर्जा की मांग बढ़ा रही है। यहाँ बिजली उत्पादन के लिए अभी भी काफी हद तक जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता बनी हुई है। इसके चलते स्थानीय स्तर पर वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की कुछ गंभीर चुनौतियाँ बनी हुई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को जलवायु संकट से निपटने के लिए और भी कड़े उपाय करने होंगे और नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग को और अधिक बढ़ावा देना होगा।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संस्थान यह भी चेतावनी देते हैं कि यदि भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश स्वच्छ ऊर्जा अपनाने में पीछे रह गए, तो वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करना कठिन हो जाएगा। इसलिए भारत सरकार की ओर से भी कई योजनाएं और पहलें शुरू की गई हैं, जिनमें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जल संरक्षण प्रमुख हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए विभिन्न जलवायु सम्मेलनों में भारत ने अपने उत्सर्जन कम करने वाले मिशन को बढ़ावा दिया है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि अब वहां से आगे बढ़कर दीर्घकालिक और प्रभावशाली रणनीतियाँ बनानी होंगी। वैश्विक स्तर पर बड़ा बदलाव देखने के बावजूद स्थानीय स्तर पर सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण ही भविष्य की दिशा तय करेगा।
अंततः, यह कहा जा सकता है कि यद्यपि सबसे खराब जलवायु परिदृश्य की संभावना कम हो गई है, वर्तमान चुनौती से निपटने और सतत जीवन शैली को अपनाने के लिए हमें अभी भी सतर्क रहना होगा। विश्व और भारत दोनों के लिए यह समय निर्णायक है, जहाँ विज्ञान, नीति और समाज को मिलकर काम करना होगा।





















































