नई दिल्ली। इस साल भारत में मानसून सामान्य से कम होने की संभावना जताई जा रही है। मौसम विभाग ने 2026 के लिए ‘विपरीत’ मानसून की भविष्वाणी की है, जिसका मतलब है कि इस बार वर्षा सामान्य से काफी कम होने की आशंका है। मानसून की ऐसी कमी भारत की कृषि एवं खाद्य सुरक्षा पर गहरा प्रभाव डाल सकती है। किसान, जो कृषि पर निर्भर हैं, उनपर इसका प्रभाव भी सीधे तौर पर पड़ेगा।
भारत की कृषि अर्थव्यवस्था मानसून पर अत्यंत आश्रित है। करीब 60 प्रतिशत किसानों की सम्बल वर्षा पर निर्भर करता है और लगभग 40 प्रतिशत औसत वर्षा का कृषि उत्पादन से सीधा संबंध होता है। कमजोर मानसून से फसल उत्पादन में गिरावट आती है, जिससे खाद्यान्न की उपलब्धता, खाद्य महंगाई और ग्रामीण भाग की आय पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
इतिहास गवाह है कि जब मानसून कमजोर पड़ा है, तब भारत के कई क्षेत्रों में फसल की पैदावार प्रभावित हुई है। उदाहरण के तौर पर, 2015 और 2019 में वर्षा निर्धारित औसत से लगभग 10% कम रही थी, जिससे खाद्य उत्पादन में कमी देखने को मिली। इस बार भी जब अपेक्षित मानसून की कमी हो सकती है, तो सरकार एवं किसानों को सावधानी पूर्वक तैयारी करनी होगी।
मानसून की कमी से जलाशयों और तालाबों के जलस्तर में कमी आ सकती है, जिससे सिंचाई की व्यवस्था प्रभावित होगी। यह स्थिति उन किसानों के लिए विशेषत: चुनौतीपूर्ण रहेगी जो सिंचाई के अभाव में पूरी तरह वर्षा पर निर्भर होते हैं। इससे कृषि क्षेत्र में निवेश कम हो सकता है और आर्थिक मंदी के संकेत भी मिल सकते हैं।
सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं, जैसे कृषि बीमा योजनाओं का विस्तार, सिंचाई सुविधाओं में सुधार, जल संचयन को बढ़ावा देना और सूखा प्रभावित इलाकों में विशेष सहायता प्रदान करना। किसानों को भी इस कमी को ध्यान में रखते हुए जल संरक्षण, फसल चक्र में सुधार और सूखे-प्रतिरोधी फसलों की खेती को अपनाने की सलाह दी जा रही है।
किसानों और सरकार के सहयोग से यदि समय पर कदम उठाए जाएं तो मौसम की इस चुनौती को कम किया जा सकता है। लेकिन यदि मानसून बेहद कमजोर रहा और योजना नहीं बनी, तो भारत की कृषि संकट में पड़ सकती है, जिससे देश को खाद्यान्न आयात पर निर्भर होना पड़ सकता है और आम जनता की जीवनयात्रा प्रभावित हो सकती है।
इसलिए किसानों, नीति निर्माताओं एवं विशेषज्ञों के लिए अब से ही सूखा प्रबंधन और संसाधनों के प्रभावी उपयोग की रणनीति बनाना आवश्यक है, ताकि 2026 का यह सूखा वर्ष व्यापक संकट में नहीं बदल जाए।





















































