Navrashtra Bharat

नई दिल्ली: विश्वविख्यात संगीतकार और ऑस्कर विजेता ए. आर. रहमान ने हिंदी फ़िल्म उद्योग को लेकर एक बेहद भावुक और ईमानदार बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि बीते कुछ वर्षों में उनके पास काम कम आ रहा है, जिसकी वजह फ़िल्म इंडस्ट्री के भीतर हुए “पावर शिफ्ट” और संभवतः एक “सांप्रदायिक सोच” भी हो सकती है—हालाँकि यह कभी सीधे तौर पर उनके सामने नहीं आई।

बीबीसी एशियन नेटवर्क को दिए एक साक्षात्कार में रहमान ने कहा कि ये बातें उन्हें सीधे नहीं कही जातीं, बल्कि “कानाफूसी” के ज़रिये उनके पास पहुँचती हैं।

“मैं काम ढूँढता नहीं, काम मुझे ढूँढे”

रहमान ने साफ कहा कि वह कभी काम की तलाश में नहीं रहते।
उनके शब्दों में,
“मैं चाहता हूँ कि मेरा काम बोले। जब मैं काम ढूँढने निकलता हूँ, तो मुझे लगता है जैसे कोई मनहूसियत जुड़ जाती है। मैं अपने काम की सच्चाई पर भरोसा करता हूँ।”

क्या भेदभाव का सामना किया?

जब उनसे पूछा गया कि क्या 1990 के दशक में बॉलीवुड में कदम रखते समय उन्हें किसी तरह का भेदभाव झेलना पड़ा, तो उन्होंने कहा कि शायद तब ईश्वर ने उन्हें इन बातों से दूर रखा।
लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि
“पिछले आठ सालों में चीज़ें बदली हैं। अब कई बार रचनात्मक लोग नहीं, बल्कि गैर-रचनात्मक लोग फैसले लेते हैं। हो सकता है इसमें कोई सांप्रदायिक पहलू भी रहा हो, लेकिन वह कभी मेरे सामने नहीं आया।”

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार उन्हें बताया गया कि फ़िल्म के लिए उन्हें चुना गया था, लेकिन बाद में म्यूज़िक कंपनी ने अपने पाँच अन्य संगीतकार रख लिए।
इस पर रहमान मुस्कराते हुए कहते हैं,
“मैंने कहा—ठीक है, मुझे आराम मिल गया, मैं अपने परिवार के साथ समय बिता लूँगा।”

दक्षिण से बॉलीवुड तक का सफ़र

59 वर्षीय रहमान ने याद किया कि वह हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में टिकने वाले पहले बड़े दक्षिण भारतीय संगीतकार थे।
उन्होंने कहा कि उनसे पहले इलैयाराजा ने कुछ फ़िल्में की थीं, लेकिन वे मुख्यधारा की नहीं थीं।
“एक बिल्कुल नई संस्कृति में जाकर स्वीकार किया जाना मेरे लिए बहुत बड़ा अनुभव था,” उन्होंने कहा।

‘ताल’ ने बनाया हर घर का नाम

हालाँकि रोज़ा, बॉम्बे और दिल से जैसी फ़िल्मों का संगीत बेहद लोकप्रिय हुआ, लेकिन रहमान मानते हैं कि उत्तर भारत में उन्हें असली पहचान 1999 की फ़िल्म ताल से मिली।
उन्होंने कहा,
“ताल हर घर की रसोई तक पहुँच गई। आज भी उत्तर भारत में वह लोगों के खून में बस चुकी है।”

सुभाष घई की सलाह और हिंदी सीखने का फ़ैसला

रहमान ने बताया कि उन्हें हिंदी नहीं आती थी और एक तमिल व्यक्ति के लिए हिंदी सीखना आसान नहीं था।
लेकिन निर्देशक सुभाष घई ने उनसे कहा—
“अगर आपको यहाँ लंबे समय तक रहना है, तो हिंदी सीखनी होगी।”
इसके बाद रहमान ने न सिर्फ़ हिंदी, बल्कि उर्दू भी सीखने का निर्णय लिया।

विवादित फ़िल्म और रहमान की सोच

रहमान ने कहा कि वह ऐसे प्रोजेक्ट्स से दूरी बनाए रखते हैं जिनकी नीयत ठीक नहीं होती।
जब उनसे विक्की कौशल अभिनीत फ़िल्म छावा को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने माना कि फ़िल्म विभाजनकारी मानी गई, लेकिन उसका मूल उद्देश्य बहादुरी दिखाना था।

उन्होंने कहा,
“लोग इतने भोले नहीं हैं कि फिल्मों से बहक जाएँ। हर इंसान के भीतर एक अंतरात्मा होती है, जो सच और चालबाज़ी को पहचान लेती है।”

बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड, लेकिन विवाद बरकरार

छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र छत्रपति संभाजी महाराज के जीवन पर आधारित यह फ़िल्म फरवरी 2025 में रिलीज़ हुई थी। ऐतिहासिक तथ्यों को लेकर विवादों के बावजूद फ़िल्म ने बॉक्स ऑफिस पर लगभग 700 करोड़ रुपये की कमाई की।

Please follow and like us:
RSS
Follow by Email
X (Twitter)
Visit Us
Follow Me
YouTube
LinkedIn
Share
Instagram

Comments (0)

Your email address will not be published. Required fields are marked *