The myopia pandemic: how changing childhoods are blurring our future

नई दिल्ली। आज के बच्चे प्राकृतिक धूप में बिताने वाले समय की तुलना में कहीं अधिक समय स्कूल, ट्यूशन कक्षाओं या स्क्रीन के सामने बिताते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलते व्यवहार के कारण मायोपिया या निकटदृष्टि की समस्या तेजी से बढ़ रही है, खासकर उन बच्चों में जो अनुवांशिक रूप से इस बीमारी के प्रति संवेदनशील हैं।

मायोपिया, जिसे सामान्य बोलचाल की भाषा में ‘निकटदृष्टि’ कहा जाता है, एक दृष्टि दोष है जिसमें व्यक्ति दूर की वस्तुओं को स्पष्ट नहीं देख पाता। हाल के वर्षों में इसका प्रकोप बच्चों में तेजी से बढ़ा है, जिससे चिकित्सकों में चिंता की लहर दौड़ गई है।

डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों का दिन का अधिकांश समय बंद कमरे में बिताना और लंबे समय तक डिजिटल उपकरणों का उपयोग करना, इस समस्या को और बढ़ा रहा है। प्राकृतिक धूप में बाहर खेलने से बच्चों की आंखों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं और आंखों को स्वस्थ रहने में मदद मिलती है।

नई दिल्ली के नेत्र विशेषज्ञ डॉ. अनुराग वर्मा कहते हैं, “बच्चों का एक्सटर्नल व्यायाम और प्राकृतिक प्रकाश में रहना मायोपिया को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। डिजिटल स्क्रीन के बढ़ते इस्तेमाल और बंद कमरों में रहने से आंखों पर अतिरिक्त तनाव पड़ता है, जो जल्द मायोपिया की समस्या उत्पन्न कर सकता है।”

अनुसंधान बताते हैं कि ऐसे बच्चे जो दिन में कम से कम दो घंटे बाहर प्राकृतिक रोशनी में बिताते हैं, उनमें मायोपिया विकसित होने की संभावना कम होती है। दूसरी ओर, जब बच्चे ज्यादातर समय घर के अंदर रहते हैं और पढ़ाई या मनोरंजन के लिए मोबाइल, टेबलेट व कंप्यूटर का अधिक उपयोग करते हैं, तो आंखों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

सरकारी और निजी संस्थान अब बच्चों के स्वस्थ नेत्र विकास के लिए जागरूकता अभियान चला रहे हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अभिभावकों को बच्चों को रोजाना बाहर खेलने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए और डिजिटल डिवाइस के इस्तेमाल को सीमित रखना चाहिए। इसके अलावा, नियमित आंखों की जांच भी आवश्यक हो गई है ताकि शुरुआती चरण में ही आँखों की समस्या का पता चल सके और उसका सही उपचार किया जा सके।

विज्ञान जगत और चिकित्सा समुदाय का मानना है कि बच्चों की जीवनशैली में बदलाव लाना अत्यंत आवश्यक है। यदि इसे नजरअंदाज किया गया तो आने वाले वर्षों में मायोपिया महामारी बच्चों और युवाओं के लिए एक बड़ा स्वास्थ्य संकट बन सकती है। इसलिए, सभी हितधारकों को मिलकर इस समस्या से निपटने के लिए सक्रिय कदम उठाने की आवश्यकता है।

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