ज़्यादातर लोग एक त्योहार के भारी खाने, किसी शादी के लंबे वीकेंड या एक देर रात को अपनी बिगड़ती सेहत का दोष दे देते हैं। यह सोचना आसान होता है, इसलिए सुविधाजनक भी। लेकिन सच यह है कि सेहत अचानक नहीं बिगड़ती। यह धीरे-धीरे बनती है वही रोज़ का जल्दी-जल्दी किया गया नाश्ता (या नाश्ता छोड़ देना), रोज़ देर से खाना, घंटों बैठना, सोने से पहले लगातार मोबाइल स्क्रॉल करना और ऐसा तनाव, जो बैकग्राउंड म्यूज़िक की तरह हर समय चलता रहता है।
हर साल जनवरी में हम वही कहानी दोहराते देखते हैं। कोई तय करता है “1 जनवरी से मैं रोज़ 5 बजे उठूंगा, बिल्कुल साफ खाऊंगा, रोज़ वर्कआउट करूंगा, चीनी छोड़ दूंगा, कार्ब्स छोड़ दूंगा, और शायद खुशी भी।” यह योजना एक हफ्ते चलती है, कभी-कभी दस दिन। फिर ज़िंदगी अपनी असल रफ्तार दिखाती है और पूरा प्लान ढह जाता है, क्योंकि वह जीने के लिए नहीं, सिर्फ आज़माने के लिए बनाया गया होता है।
क्यों निरंतरता, तीव्रता से ज़्यादा असरदार है
हमारा शरीर तब सबसे अच्छा काम करता है जब उसकी दिनचर्या तालमेल में हो। शरीर की कोशिकाएं उस चीज़ के अनुसार ढलती हैं, जो आप रोज़ दोहराते हैं न कि उस प्रयास के अनुसार, जो आप जोश में आकर एक बार करते हैं। जब सोने-जागने का समय नियमित होता है, तो हार्मोन संतुलित होते हैं। जब भोजन सादा और समय पर होता है, तो पाचन तंत्र शांत रहता है। और जब तनाव को रोज़ थोड़ा-थोड़ा संभाला जाता है, तो तंत्रिका तंत्र भी सहज हो जाता है।
शुरुआत छोटी रखें एक तय सोने का समय, ज़्यादातर दिन घर का बना खाना, रोज़ की एक पक्की सैर, और पाँच मिनट की गहरी सांसें। धीरे-धीरे शरीर आप पर फिर से भरोसा करने लगता है।
वह रोज़ की लय, जिसे आपका शरीर समझता है
हमारा शरीर एक लय पर चलता है। जब यह लय सही होती है, तो शरीर खुद को ठीक करने में सुरक्षित महसूस करता है। लेकिन जब हफ्तों तक अव्यवस्था रहती है, तो शरीर सिर्फ़ “बचाव मोड” में चला जाता है। लंबे समय तक बेहतर महसूस करने वाले लोग वे नहीं होते, जो दस दिन में सब कुछ कर लेते हैं। वे होते हैं, जो कुछ बुनियादी चीज़ें ज़्यादातर दिनों दोहराते रहते हैं भले ही पूरी तरह परफेक्ट न हों।
ये हैं वे ज़रूरी आधार, जिन पर लौटकर आना चाहिए:
1. दिन की शुरुआत ऐसे करें, जैसे कोई आपको दौड़ा नहीं रहा
सुबह की रोशनी, पानी, पहला घंटा शांत रखना और हल्की-सी गतिविधि। आपका नर्वस सिस्टम इनबॉक्स से पहले ही माहौल तय कर लेता है।
2. ऐसा खाएं, जिसकी आपके पेट को आदत हो सके
नियमित समय पर खाना, ज़्यादातर दिन असली और सादा भोजन, और खाने के बीच थोड़ा अंतर। पेट उन्हीं चीज़ों पर अच्छा प्रतिक्रिया देता है, जो आप लगातार देते हैं।
3. शरीर को सज़ा देने के लिए नहीं, जीवन का संचार करने के लिए चलें
खाने के बाद टहलना, हफ्ते में कुछ दिन ताकत वाला व्यायाम, और रोज़ थोड़ी मोबिलिटी। यहाँ भी निरंतरता ही जीतती है।
4. शाम को दवा की तरह संभालें
थोड़ा जल्दी खाना, स्क्रीन से दूरी, और एक तय सोने का समय। असली मरम्मत यहीं होती है।
ज़्यादातर लोगों को नई जानकारी की ज़रूरत नहीं होती। उन्हें एक शांत, दोहराने योग्य जीवनशैली की ज़रूरत होती है। जब आप चरम सीमाओं के बीच झूलना बंद करते हैं और शरीर को स्थिर संकेत देने लगते हैं, तो वह खूबसूरती से प्रतिक्रिया देता है।
इसलिए तीव्र नहीं, इरादतन बनिए। डर के बजाय सकारात्मक सोच अपनाइए।
जो इस हफ्ते काम आया, उसे नोटिस करें और दोहराएं।
सेहत सज़ा से नहीं बनती, अभ्यास से बनती है।





























