कटक। ओडिशा उच्च न्यायालय ने एक अहम और सख्त कदम उठाते हुए राज्य के उच्च शिक्षा विभाग के आयुक्त-सह-सचिव अरविंद अग्रवाल के खिलाफ गंभीर अवमानना के आरोप में गिरफ्तारी वारंट जारी करने का आदेश दिया है। यह कार्रवाई न्यायालय के उस पूर्व आदेश का पालन न करने पर की गई है, जिसमें एक सेवानिवृत्त कर्मचारी को देय वार्षिक वेतनवृद्धि से जुड़े मामले में समयबद्ध निर्णय देने का निर्देश दिया गया था।
यह मामला उच्च शिक्षा विभाग के कर्मचारी तपन कुमार पटनायक से जुड़ा है, जिन्होंने आरोप लगाया था कि सेवानिवृत्ति के करीब होने के कारण उन्हें उनकी वैध वेतनवृद्धि से वंचित कर दिया गया। पटनायक ने 7 अप्रैल 2025 को विभाग के समक्ष विस्तृत प्रतिवेदन देकर वेतनवृद्धि की मांग की थी, लेकिन सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध होने के बावजूद विभाग की ओर से कोई निर्णय नहीं लिया गया।
इसके बाद पटनायक ने न्यायालय की शरण ली। 30 जुलाई 2025 को ओडिशा उच्च न्यायालय ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे आठ सप्ताह के भीतर प्रतिवेदन पर निर्णय लेकर याचिकाकर्ता को सूचित करें। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने दलील दी थी कि वेतनवृद्धि स्वचालित नहीं होती, बल्कि निर्धारित शर्तों पर निर्भर करती है, फिर भी न्यायालय को यह आश्वासन दिया गया कि शिकायत का समयबद्ध निपटारा किया जाएगा। इसी भरोसे पर अदालत ने याचिका का निपटारा कर दिया था और यह भी स्पष्ट किया था कि जानकारी जुटाने के बहाने अनावश्यक देरी स्वीकार नहीं की जाएगी।
आदेश के पालन न होने पर पटनायक ने अवमानना याचिका दाखिल की। 12 दिसंबर 2025 को अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता ने अदालत को भरोसा दिलाया कि अगली तारीख तक अनुपालन रिपोर्ट पेश कर दी जाएगी, लेकिन इसके बावजूद कोई कार्रवाई या रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं की गई।
सोमवार को अपलोड किए गए आदेश में न्यायालय ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह केवल आदेश की अवहेलना नहीं, बल्कि अदालत को दी गई प्रतिबद्धता का भी उल्लंघन है, जो गंभीर अवमानना की श्रेणी में आता है। इसके चलते अदालत ने विभाग के आयुक्त-सह-सचिव अरविंद अग्रवाल के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने का निर्देश दिया, ताकि उनकी उपस्थिति 22 जनवरी 2026 को सुनिश्चित की जा सके।
हालांकि, न्यायालय ने उन्हें अंतिम अवसर देते हुए यह भी कहा है कि यदि वे इस बीच आदेश का पूर्ण अनुपालन कर रिपोर्ट प्रस्तुत कर देते हैं, तो इस दमनात्मक कार्रवाई से बचा जा सकता है। यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही और न्यायालय के आदेशों की अनदेखी पर एक कड़ा संदेश माना जा रहा है।


